#सपनों का मलबा, उजड़ीं कई जिंदगियां: वैज्ञानिक, अफसर, डॉक्टर बनने आए थे दिल्ली, इमारत ढहने से सब खत्म#




सपनों का मलबा, उजड़ीं कई जिंदगियां: वैज्ञानिक, अफसर, डॉक्टर बनने आए थे दिल्ली, इमारत ढहने से सब खत्म
दक्षिण दिल्ली के सैदुल्लाजाब में शनिवार रात ढही सात मंजिला इमारत के मलबे में सिर्फ ईंट, सीमेंट और सरिए नहीं दबे थे, बल्कि उन हजारों सपनों की कहानियां भी दफन हो गई, जिन्हें छोटे शहरों और गांवों से आए युवाओं तथा उनके परिवारों ने वर्षों की मेहनत, त्याग और संघर्ष से सींचा था। किसी पिता ने बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए जमीन बेच दी थी तो किसी मां-बाप ने बेटे को अधिकारी बनाने की उम्मीद में कर्ज लिया था। कोई बेहतर भविष्य की तलाश में अपना घरबार छोड़कर दिल्ली आया था। लेकिन एक झटके में इमारात के साथ उनके सपने भी जमींदोज हो गए। हादसे ने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी। अलवर की एकता, बिहार के नवादा के नलिन और नेपाल की पार्वती जैसे नाम अब केवल हादसे के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन अधूरे सपनों और बिखरे अरमानों की पहचान बन गए हैं जिन्हें यह त्रासदी हमेशा के लिए अपने साथ ले गई।
इंटरव्यू की खुशी मातम में बदली
शनिवार कपिल के जीवन का सबसे खास दिन था। वर्षों की मेहनत के बाद वह भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) में वैज्ञानिक पद के इंटरव्यू देकर लौटे थे। परिजनों के अनुसार इंटरव्यू बेहद अच्छा रहा था और उन्हें चयन की पूरी उम्मीद थी। खुशी साझा करने के लिए उन्होंने शाम को अपने दोस्तों को कैंटीन में पार्टी दी। सभी भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रहे थे कि तभी इमारत भरभराकर ढह गई। कपिल मलबे में दब गए, जबकि उनके पांच दोस्त बच निकले। घंटों चले बचाव अभियान के बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। वैज्ञानिक बनने का उनका सपना हादसे के मलबे में हमेशा के लिए दफन हो गया।
हादसे में जान गंवाने वालों में बिहार के नवादा निवासी नलिन भी शामिल हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह भारतीय रेलवे में अधिकारी बनने का सपना लेकर दिल्ली आए थे और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। परिवार में सबसे छोटे और सभी के चहेते नलिन अक्सर कहते थे कि नौकरी मिलने के बाद सबसे पहले माता-पिता के लिए पक्का घर बनवाएंगे। हादसे से कुछ मिनट पहले वह अपने दोस्त के साथ कैंटीन में पराठा खाने पहुंचे थे। दोस्त ने बताया कि वह दही लेने बाहर निकला था, तभी जोरदार धमाका हुआ और देखते ही देखते पूरी इमारत धूल के गुबार में बदल गई। रविवार सुबह जब नलिन का शव मलबे से निकाला गया तो परिवार की उम्मीदों का भी अंत हो गया।
अलवर की रहने वाली एकता के पिता रमेश ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि जिस बेटी के भविष्य के लिए उन्होंने अपनी जमीन तक बेच दी, उसकी जिंदगी का अंत इस तरह होगा। परिवार के अनुसार, एकता बचपन से ही मेधावी थीं और डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं। आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने उनकी पढ़ाई में कभी बाधा नहीं आने दी। एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए एकता को किर्गिस्तान भेजा गया। इसके लिए परिवार ने कर्ज लिया और अपनी जमीन भी बेच दी। वर्षों के संघर्ष और त्याग के बाद एकता डॉक्टर बनकर भारत लौटीं। परिवार को विश्वास था कि अब उनके अच्छे दिन शुरू होंगे। लेकिन आगे बढ़ने की चाह में वह दिल्ली आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगीं। सैदुल्लाजाब हादसे ने न सिर्फ उनकी जिंदगी छीन ली, बल्कि उस परिवार की वर्षों की मेहनत, उम्मीद और त्याग को भी मलबे में दबा दिया, जिसने बेटी के सपनों के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के तरबगंज निवासी 26 वर्षीय रवि उन हजारों विदेशी मेडिकल स्नातकों में शामिल थे,, जो डॉक्टर बनने का सपना लेकर संघर्ष कर रहे थे। किर्गिस्तान की जलाल-अबाद स्टेट यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस करने वाले रवि की पढ़ाई पर परिवार ने करीब 30 लाख रुपये खर्च किए थे, जिसके लिए कर्ज भी लेना पड़ा। अगस्त 2024 में भारत लौटने के बाद वह 28 जून को होने वाली एफएमजीई परीक्षा की तैयारी में जुट गए थे।
पहले प्रयास में असफल रहने के बाद रवि ने पूरी मेहनत के साथ दोबारा तैयारी शुरू की थी। दोस्तों के अनुसार वह रोज देर रात तक पढ़ाई करता था और परिवार पर चढ़े कर्ज को लेकर भी चिंतित रहता था। उसके पिता किसान हैं और परिवार को उम्मीद थी कि रवि डॉक्टर बनकर उनकी आर्थिक स्थिति बदलेगा। लेकिन सैदुल्लाजाब हादसे ने यह सपना अधूरा छोड़ दिया। परीक्षा से पहले ही रवि की मौत ने परिवार की उम्मीदों और वर्षों के संघर्ष को मलबे में दफन कर दिया।
नेपाल के धनगढ़ी से दिल्ली आईं पार्वती ने बेहतर भविष्य की तलाश में एक छोटी सी कैंटीन शुरू की थी। धीरे-धीरे यह कैंटीन आसपास रहने वाले छात्रों का दूसरा घर बन गई। वह छात्रों की पसंद-नापसंद का ख्याल रखती थीं। बीमार होने पर दवा लेने की सलाह देतीं और समय पर खाना खाने की याद भी दिलाती थीं। उनका सपना था कि एक दिन इस छोटी कैंटीन को बड़े होटल में बदलें और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करें। लेकिन इमारत गिरने के बाद गंभीर रूप से घायल पार्वती को बचाया नहीं जा सका। उनके साथ वह सपना भी खत्म हो गया जिसे वह मेहनत और उम्मीदों के सहारे आकार दे रही थीं।

